कौन कहता ह मे बेघर हु। . . . . . . . .


कौन कहता ह मे बेघर हु।  . . . . . . . .

कौन कहता ह मे बेघर हु।  मेरे ख्यालो मे भी एक घर ह जिसका नाम मैंने कायनात रखा ह
जिसकी दिवार सुनहरी सी और पर्दे उजली रौशनी से ह
एक आईना ह जो डाँटता रहता ह एक दम पापा की तरह, एक खाली सन्दूक ह बिलकुल मेरी मम्मी की तरह
कौन कहता ह मे बेघर हु।  मेरे ख्यालो मे भी एक घर ह. . . . . . . .
एक अलमारी ह कुछ गौरी कुछ सावली सी बिलकुल मेरी चाची की तरह , एक टूटी हुई चार पाई ह बिलकुल मेरी दादी माँ की तरह , कौन कहता ह मे बेघर हु।  मेरे ख्यालो मे भी एक घर ह. . . . . . . .
मेरी शरीके हयात फिजा ह और  एक छोटी सी बच्ची मनदशा ह शाम होते ही जिस वक्त खाली हाथ घर को आता हु मुस्कुरा देते ह सब और मर जाता हु मै।
कौन कहता ह मे बेघर हु।  मेरे ख्यालो मे भी एक घर ह. . . . . . . .
कौन कहता ह मे बेघर हु।  मेरे ख्यालो मे भी एक घर ह जिसका नाम मैंने कायनात रखा ह। .... .......


















  ध्यान दे -यह मेरी निजी राय, विचार और सोच ह |

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