खुद को मैं रोज पढता हूँ फिर छोड़ देता हूँ एक पन्ना जिदंगी का मैं रोज मोड देता हूँ......
खुद को मैं रोज पढता हूँ फिर छोड़ देता हूँ एक पन्ना जिदंगी का मैं रोज मोड देता हूँ...... खुद को मैं रोज पढता हूँ ऊठता हूँ रोज और भगवान के दशर्न करता हूँ क्या करु ओर क्या नही, रोज सुबह नये अरमान देखता हूँ फिर छोड़ देता हूँ एक पन्ना जिदंगी का मैं रोज मोड देता हूँ...... खुद को रोज पढता हूँ नहाता हूँ खाता हूँ और ओफिस को चला जाता हूँ रोज आफिस में बोस से टार्गेट लेता हूँ पता ह मुझे कितने लोगों को रोज मिलता हूँ... फिर छोड़ देता हूँ एक पन्ना जिदंगी का मैं रोज मोड देता हूँ...... खुद को मैं रोज पढता हूँ दिन भर की भाग दोड के बाद दिन का काम समाप्त करके शाम को फिर बोस को रिपोर्ट करता हूँ कुछ शाबाशी तो कुछ गलतियो पर डाँट सुनता हूँ गुस्सा होता हूँ फिर छोड़ देता हूँ एक पन्ना जिदंगी का मैं रोज मोड देता हूँ...... सबके हालातो को रोज देखता हूँ लोगों को समझने की कोशिश करता हूँ खुद के अन्दर झाँँकता हूँ कुछ चिजों को सिकता हूँ कुछ को फिर छोड़ देता हूँ एक पन्ना जिदंगी का मैं रोज मोड देता हूँ...... खुद को मैं रोज पढता हूँ थका हारा शाम को घर पहुंचता हूँ घरवालों के साथ खुशीयाँँ बाटन...